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आखिर क्या है कश्मीर समस्या ? और उत्तराखंड पर इसका प्रभाव

मैं उस वक्त 8 साल का था जब करगिल युद्ध हुआ था। मेरे पिता जी उस वक्त बागेश्वर जिले के खुनौली गांव में कार्यरत थे। हमारे पडोसी कांडपाल जी के ४ बेटों में से ३ सेना में कार्यरत थे और उनकी तैनाती भारत पाकिस्तान सीमा पर थी। कांडपाल जी के पुरे परिवार के साथ मुझे भी समाचार पत्र का इंतिजार रहता था और समाचार पत्र खोलने से पहले हमारे दिल की धड़कने तेज हो जाती कि  कहीं आज आये शहीदों की सूचि में कांडपाल जी के बेटों  में से किसी का नाम तो नहीं। उस वक्त मोबाइल और टेलीफोन की सुविधा नहीं थी और लोग पूरी तरह समाचार पत्र, रेडियो या चिट्ठियों पर ही निर्भर थे। महीनों चले जंग में भारत माता के कई सपूत शहीद हुए, उनसे से बहुत से देव भूमि उत्तराखंड के लाल भी थे। मैं  जब कभी किसी से पूछता की क्यों हो रही है ये जंग? लोग जवाब देते कि  की कश्मीर को उसकी सुंदरता के कारण धरती का स्वर्ग कहते हैं, इसीलिए पाकिस्तान उसपे कब्ज़ा करना चाहता है।

शायद यहीं को जवाब है जो अधिकतर हम सब बचपन में अपने बड़ों से सुनते आये आएं हैं। भारत के हर एक नागरिक को कश्मीर में होने वाली जंग किसी न किसी रूप से प्रभावित करती है, लेकिन विडम्बना देखिये कि आखिर कश्मीर मसला है क्या यह बात महज कुछ लोगो को पता है, क्यूंकि हमारी पुरानी सरकारों ने इस देश के लोगो को हमेशा धोखे में रखा है। बचपन से ही इतिहास और राजनीति में रूचि होने के कारन मैंने सुनी सुनाई बातों पे भरोसा न करके तह तक जाने की कोशिश की । पाकिस्तानी और कश्मीरी न्यूज़ पोर्टल्स पढ़ने और टीवी चैनल्स देखने शुरू किये। भारत के तत्कालीन लेखकों की किताबें भी पढ़ीं, उसके बाद जो सच सामने आया, वो  उसके उलट था जो हमें सिखाया जाता रहा। इस पुरे मसले को मैं कुछ पंक्तियों में समेटने की कोशिश कर रहा हूँ।

कश्मीर समस्या की नींव तभी खुद गयी थी जब भारत आजाद हो रहा  था । ब्रिटिश जब भारत की सत्ता हस्तानांतरित करके जाने लगे तब पूरा भारत दो हिस्सों में बंट गया था, एक धड़ा वो था जोकि की कांग्रेस की विचारधारा को फॉलो करता था और दूसरा मुस्लिम लीग को। कांग्रेस के विचारधारा के अनुसार भारत एक धर्म निरपेक्ष मुल्क होगा जहाँ किसी भी धर्म का राजनीति में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा,बिना जाती और धर्म देखे किसी भी सीट से कोई चुनाव लड़ सकता है और उस सीट से प्रतिनिधित्व कर सकता है। लेकिन मुस्लिम लीग का मनना था की भारत इस्लामिक शरीयत आधारित देश बने जहाँ इस्लाम भारत का मुख्या मजहब हो दूसरे धर्म के लोगो को देश में रहने के लिए जजिया कर लगाया जाये। मुस्लिम लीग की यह विचारधारा इस्लामिक प्रभुत्ववादी विचारधारा पर आधारित थी।

अत: मुहम्मद अली जिन्नाह के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने दो कौमी नजरिये के आधार पर भारत के टुकड़े करने की पेशकश की। दो कौमी नजरिए के अनुसार हिन्दू और मुस्लिम दो अलग अलग देश हैं और दोनों साथ नहीं रह सकते। इस्लाम के अनुसार अल्लाह के बजाय मूर्तिओं की पूजा करना, कई देवी देवताओं की पूजा की शैतान की पूजा है। ऐसे में हिन्दू जोकि बुतपरस्त हैं(मूर्तिपूजक) उनके ऊपर मुस्लमान राज्य तो कर सकते हैं लेकिन कभी बराबरी का दर्जा नहीं दे सकते। इस तरह जो भाग मुस्लिम बाहुल्य थे वो पाकिस्तान के हिस्से गए और जहाँ हिन्दू – सिख- बुध- जैन आबादी जादा थी वो भारत के हिस्से आये। सिंध, पश्चिमी पंजाब, खैबर पख्तून और पूर्वी बंगाल वो भूभाग थे जो पाकिस्तान का हिस्सा बने और बाकि सभी राज्य भारत के हिस्से आये । बड़े पैमाने पे लोगों का सीमा के इस पर से उस पार और उस पार से इस पास पलायन हुआ। मुस्लिम लीग के इस पागलपन ने दोनों धर्मों के लाखों लोगो का कतल करवा दिया, क्यूंकि आबादी के अदला बदली के वक्त हिंसा फूट पड़ी थी। भल्लभ भाई पटेल की सूझ बुझ की वजह से सभी रियासतें भारत का हिस्सा बनीं लेकिन कश्मीर के राजा हरि सिंह ने भारत और पाकिस्तान किसी में भी शामिल ना होने का निर्णय लिया।

बटवारे के अनुसार पाकिस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र बना, पाकिस्तान की विचारधारा इस्लामिक विचारधारा पे आधारित थी, जिसके अनुसार दुनिया दो हिस्सों में बटीं हुयी है मुस्लिम( अल्लाह को मानाने वाले) और काफिर( इस्लाम के दुश्मन जोकि अल्लाह को ना मानकर दूसरे शक्तियों की पूजा करते हैं)। कश्मीर के राजा एक काफिर(हिन्दू) थे और आबादी मुस्लिम थी। कश्मीर के मुस्लिम धर्मगुरुरों  का मनना था कि काफिर हिन्दू राजा इस्लाम के दुश्मन हैं और उन्होंने पाकिस्तान सरकार को कश्मीर को इस्लामिक सल्तनत पाकिस्तान में शामिल करने की इच्छा जताई।

22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्ज़ा करने  मकसद से कश्मीर घटी पर हमला। पाकिस्तानी सेना से हार जाने की डर से राजा हरि सिंह ने भारत सरकार से मदद मांगी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सेना भेज कर कश्मीर का लगभग दो तिहाई हिस्सा बचा लिया और गिलगिट बाल्टिस्तान सहित कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया और उस वक्त से कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया।

Kashmiri Pundit

इस हार के बाद भी पाकिस्तान कश्मीर में प्रशिक्षित आतंकवादी भेजते रहा। सन 1990 में पाकिस्तानी आतंकवादियों की मदद से कश्मीरी मुसलमानो ने लगभग 1 हजार कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतार दिया और कई हिन्दू औरतों का बलात्कार किया गया। मुसलमानो से अपनी बेटियों की इज्जत बचने के लिए कश्मीरी हिन्दुओं ने अपनी बेटियों का घला घोंट कर उन्हें खुद मार डाला। मस्जिदों से आवाजें आरही थी " ऐे जालिमों, ऐ काफिरों कश्मीर हमारा है कश्मीर छोर दो", "हमें हमारा कश्मीर चाहिए , हिन्दू औरतों के साथ लेकिन मर्दों के बगैर"। इस तरह लाखो कश्मीरी हिन्दू रातों रात घर से बेघर हो गए और जम्मू सहित देश के विभिन्न हिस्सों में टेंट्स में रहने को मजबूर हुए। लेकिन पूरा देश खकोश रहा, किसकी को कश्मीरी हिन्दुओं की आहें नहीं सुनाई दी।

कश्मीर समस्या एक ऐसी विचारधारा की देन है जो की यह कहती है की जहाँ भी मुस्लिम आबादी जादा हो जाये वहां मुसलमानों को काफिरों के खिलाफ जिहाद छेड़ देना चाहिए। इसलिए कश्मीर भारत के गले की फांस बन चुका है। अगर भारत सरकार कश्मीर को  अलग राष्ट्र का दर्ज दे देती है तो मुस्लिम समाज भारत के और भी हिस्से करने की मांग उठाएगा साथ ही साथ बहुसंख्यक समाज भी यह सोचेगा की बटवारा जब धर्म के आधार पर हुआ था तो कांग्रेस ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाकर मुस्लिम अलगाववादी सोच को फिर से पनपने दिया जो देश की अखंडता और गैर मुस्लिम लोगो के लिए खतरा है।

उत्तराखंड और पडोसी राज्य हिमाचल प्रदेश के लगभग हर दूसरे युवक का सपना सेना में जाने का होता था। ये दोनों राज्य ऐसे राज्य हैं जहाँ की जादातर पुरुष आबादी भारतीय सेना में कार्यरत हैं, इसलिए जब कभी भारत पाक सेना पर गोलियों की आवाज तेज होती है, यहाँ पर लोगों के दिलो की धड़कने भी तेज हो जाती हैं.

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Gaurav Singh
Thinker, Writer, Story Teller & History Lover

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