मलाणा : प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर समेटे एकमात्र प्राचीन लोकतंत्र - Himalayan Buzz
You are here
Home > People > मलाणा : प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर समेटे एकमात्र प्राचीन लोकतंत्र

मलाणा : प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर समेटे एकमात्र प्राचीन लोकतंत्र

हिमाचल की कुल्लू घाटी अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए देश-विदेश के पर्यटकों के बीच प्रसिद्ध है । यहाँ का अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य बरबस ही लोगों को आकर्षित करता है । यहीं कुल्लू की पार्वती घाटी में स्थित चंद्रखणी पर्वत के आलय में बसा है विश्व का प्राचीनतम लोकतंत्र मलाना गाँव । नदी से सटी खूबसूरत पहाडियों पर लगभग समुद्र तल से 8500 फुट की ऊंचाई पर बसा मलाना गांव शहरी सभ्‍यता और आधुनिकता से काफी समय तक अनछुआ रहा है । ये गाँव तीन पहाड़ी दर्रों से घिरा हुआ है । मलाणा से सम्बंधित कई प्रकार की रहस्यमयी जनश्रुतियां प्रचलित हैं । 
इस गाँव के उद्भव काल से लेकर यहाँ के निवासियों और परंपराओं तक के बारे में अलग-अलग कहानियां सुनने को मिलती हैं । यहाँ की भवन निर्माण कला , रहस्यमयी कनाशी भाषा , परम्पराएं और विधान , यहां का लोकतांत्रिक ढांचा सब अपने कप में एक उत्सुकता और रहस्य समेटे हुए हैं । मलाणा की अद्वितीय भौगोलिक परिस्थितियां इसकी जैव विविधता और प्राकृतिक स्वरुप को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं । मलाणा को 'छोटे यूनान' (little Greece) की संज्ञा भी दी जाती है । 
मलाणा गाँव दो भागों में बांटा गया है , जिन्हें ऊपरी मलाणा (धाराबेहड़) और निचले मलाणा (सेरीबेहड़) के नाम से जाना जाता है । मलाणा गाँव मुख्यता राजपूतों का गाँव है । अन्य जाति के केवल दो ही परिवार ऐसे हैं जिन्हें यहाँ के लोगों द्वारा गाँव में रहने की अनुमति दी गई है । ये परिवार देव उत्सव के दौरान वाद्ययंत्र में ढोल और नगाड़े बजाते हैं । गाँव के मध्य में चौकोर शिलाओं से सुसज्जित स्थान है , जहाँ स्थानीय ग्रामीण दिन भर विभिन्न तरीकों से समय व्यतीत करते हैं । जिसमे प्रमुख है चौसर के समान पासे खेलना । जिन्हें स्थानीय ग्रामीण पांजी कहते हैं । 
वैसे यहाँ के ग्रामीण अत्यन्त मित्रता पूर्ण स्वभाव के हैं , परंतु गाँव में बाहरी लोग क्या कर सकते हैं और उनके लिए क्या निषेध है , इसकी एक लंबी सूची ग्रामीणों द्वारा बनाई गई है । जगह-जगह निषिद्ध क्रियाकलापों की सूचना देते बोर्ड लगाए गए हैं । बाहरी व्यक्तियों को गांव की अधिकतर चीज़ों को छूने की मनाही है । यहाँ आप फोटोग्राफी तो कर सकते हैं , पर दैवीय स्थलों की वीडियोग्राफी करने पर रोक है । इन नियमो का उलंघन करने पर आपको जुर्माना देना पड़ता है या किसी विशेष परिस्थिति में ग्रामीण आपको गाँव छोड़ने के लिए भी कह सकते हैं।

 गाँव तक पहुंचने का मार्ग

Malana 11इस गांव तक पहुंचने के लिए मुख्यता दो रास्ते हैं । किसी समय यहाँ पहुँचने के लिए जरी से 15 किमी का पैदल ट्रैक करना पड़ता था । परंतु मलाणा पावर प्रोजेक्ट बनने के उपरान्त अब ये दूरी काफी कम हो गई है । वाहन मार्ग के अलावा अब केवल 4 किलोमीटर का ही पैदल मार्ग रह गया है । भुंतर से मणिकर्ण घाटी के जरी नामक स्थान तक वाहन द्वारा पहुंचा जा सकता है । वहां से मलाणा का प्रवेश द्वार आरम्भ होता है । ये मार्ग गाँव तक पहुंचने की अपनी सुगमता के कारण अधिक प्रचलित है । मलाणा हाइडल प्रोजेक्ट बन जाने से जरी से बराज तक सुंदर सडक बन गयी है, जिससे गाडियां बराज तक पहुंचने लग गई हैं। यहां से पार्वती नदी के साथ-साथ रशोल पास के अंतर्गत करीब 2 किमी. चलने के बाद शुरू होती है 3 किमी. की सीधी चढ़ाई, पगडंडी के रूप में। छोटे बड़े झरनों और प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण घने जंगल का सुरम्य माहौल थकान महसूस नहीं होने देता, पर रास्ता बेहद बीहड तथा दुर्गम है। कहीं-कहीं तो पगडंडी सिर्फ़ दो फ़ुट की रह जाती है , सो बहुत संभल के चलना पड़ता है । इसके अलावा कुल्लू मुख्यालय से तथा कुल्लू से मनाली की ओर 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नग्गर गाँव से भी मलाणा के लिए मार्ग है । परंतु ये मार्ग आम लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण है , क्योंकि ये काफी कठिन पैदल मार्ग है । पहले घने जंगलों के बीच से दुर्गम चढ़ाई चढ़ते हुए हिमाच्छादित चंद्रखणी पर्वत के शिखर तक पहुंचना पड़ता है और उसके बाद तीक्ष्ण ढलान पर सावधानी से नीचे उतरना पड़ता है । इस पैदल यात्रा में दो दिनो का समय भी लग सकता है । ट्रैकिंग का रोमांच पसंद करने वाले मुख्यतः इसी मार्ग से छोटे दलों में मलाणा गाँव के लिए जाते हैं । यहां पहाडों पर रहने वालों के लिए तो ऐसी चढ़ाईयां आम बात है पर मैदानों से जाने वालों को तीखी चढ़ाई और विरल हवा का सामना करते हुए मलाणा गांव तक पहुंचने में थोड़ी बहुत कठिनाई आ सकती है । हिमाचल के सुरम्य व दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसे इस गांव, जिसका सर्दियों में देश के बाकि हिस्सों से नाता कटा रहता है, के ऊपर और कोई आबादी नहीं है।

गाँव का इतिहास और इससे जुडी किंवदन्तियाँ – 

Malana6इस गांव के बारे में कई किम्वदंतियां हैं। वैसे गाँव के इतिहास से सम्बंधित कोई आधिकारिक लेख उपलब्ध नहीं हैं , परंतु दंतकथाओं के अनुसार जब सिकंदर भारत पर हमला करने आया था तो उसके कुछ सैनिक उसकी सेना छोड़ कर भाग गए थे । इन्हीं भगोड़े सैनिकों ने मलाणा गांव को बसाया था। उनके ग्रीक होने के कुछ पुष्ट प्रमाण भी हैं। लकड़ी के बने उनके अत्यन्त लेकिन कलात्मक मंदिरों में जो उकेरी हुई आकृतियां हैं, उनमें घुड़सवार सैनिक, हाथी, शराब पीते हुए सैनिक हैं, जिन्होंने फ्राकनुमा एक वस्त्र पहन रखा है। यह मूलतः उस युग के ग्रीक सैनिकों की पोशाक हुआ करती थी। साथ ही गांव वासियों के शरीर की बनावट, चेहरे-मोहरों में और गतिविधियों में स्थानीय और भारतीयता का अभाव है। इसके अलावा कई लोगों और बच्चों की आंखे नीली हैं। कहा जाता है कि इन सैनिकों ने आसपास के गांवों की लड़कियों से शादी – विवाह किये और वे भेड़ें चराकर और गेहूं की खेती करके गुजर-बसर करने लगे। शुरू-शुरू में इन भगोड़े सैनिकों ने पहचान लिए जाने के डर से अपने आपको पूरी दुनिया से अलग रखा था। बाद में यही अलगाव उनका जीवन-दर्शन बन गया।
एक कहानी ये भी है –गाँव के बारे में एक कहानी ये भी है कि मलाणा की नींव कुल्लू के काली बिजली गांव के दो सगे भाईओं ने डाली थी। एक दिन दोनों भाई शिकार की तलाश में काफी दूर निकल गए। शाम हो जाने पर उन्हें गांव लौटना असंभव लगा। अत: उन्होंने रात के भोजन के लिए सत्तू घोलते समय उसमें मिले जौ के कुछ साबुत दाने धरती पर बो दिए और कुछ दिन बाद ही उन्होंने आश्चर्य से देखा कि वहां जौ के पौधे उग आये है। उस धरती की उर्वरता देखकर दोनों भाईओं ने वहीँ बस जाने का फैसला किया । बड़ा भाई विवाहित था और वह गांव जाकर अपनी पत्नी को भी साथ ले आया। इन तीनों का पहला आश्रय एक गुफा बनी। कहा जाता है कि मलाणा में आज जो हरिजन परिवार रह रहा है वे बड़े भाई के वंशज है। ये कहानी आज भी गांव में मौजूद है।

गाँव से जुड़ा अकबर और सिकंदर का रोचक इतिहास – एक किस्सा सम्राट अकबर के बारे में भी है। सुनते हैं कि किसी रोग से निजात पाने के लिए एक फकीर के कहने पर अकबर पैदल चलकर मलाना के मंदिर गया और वहां अपनी तस्वीर वाली स्वर्ण मुद्राएं चढ़ाई । बताया जाता था कि वे मुद्राएं मंदिर में सुरक्षित हैं। कहा तो यह भी जाता था कि सिकंदर के भगोड़े सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र भी एक शस्त्रागार में सुरक्षित हैं, लेकिन अभी तक किसी ने देखा नहीं। 
इसके बाद भी एक बार अकबर ने ग्राम देवता ऋषि जमदग्नि की भी परीक्षा लेनी चाही । जिससे कुपित होकर देवता ने उस समय में दिल्ली में बर्फ गिरा दी । तब अकबर को दंड के रूप में देवता को स्वर्ण अश्व दान और चांदी के हिरन दान करने पड़े थे । मलाणा विश्व का इकलौता स्थान है जहाँ अकबर की हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पूजा की जाती है । आज भी गांववासी साल में एक बार अकबर की पूजा करते हैं , जिसे देखने की इजाजत किसी को नहीं होती। 


गाँव की अपनी लोकतांत्रिक संसद

Malana2सबसे आश्चर्यजनक इस गांव का प्रजातांत्रिक ढांचा है। मलाणा के लोग अपने ग्राम के प्रशासन के लिए सदस्यों का चुनाव करते हैं। एक निचली संसद और दूसरी ऊपर की संसद। निचली न्यायपालिका का नाम कनिष्टांग और ऊपरी का नाम ज्येष्टांग है। ज्येष्टांग में गयारह सदस्य हैं जिनमें तीन स्थायी और आठ अस्थायी। ये आठ चार वार्डों से जिन्हें चुग कहते हैंचुने जाते हैं। इन सदस्यों को जेठरा कहते हैं। स्थायी सदस्यों में कार्मिष्ठ अर्थात ग्राम का मुखिया शामिल है जो मुख्य प्रशासक है। वह देवता की इच्छा से कार्य करता है। दूसरा जमलू देवता का पुजारी होता है। उसका मुख्य काम देवता की पूजा और धार्मिक रीतियों को सुचारू रूप से करवाना है। तीसरा स्थायी गुर है जिसे देवता स्वयं चुनते हैं। कभी ऐसा होता है कि देवता की ऊर्जा किसी व्यक्ति के अंदर प्रवेश कर जाती हैवह कांपता है और भविष्य वाणी करता है। उसका चुनाव गुर के रूप में हो जाता है। बाकी आठ का चुनाव होता है। निचले हाऊस को ‘कोर’ कहते हैं। हर एक निर्णय में ऊपरी न्यायपालिका और निचली न्यायपॉलिका की स्वीकृति ज़रूरी है। कभी-कभी दोनों सदनों में विचार भिन्नता होती है। इस न्यायिक तंत्र जेदांग की सहायता के लिए चार अफसर (फोगलदार) होते है। ये जमलू देवता के नाम पर कार्य करते हैं। वैसे अभी कुछ वर्षों तक मलाणा का कोई मामला कुल्लू अदालत में नहीं आता था । सभी मामले इस न्याय तंत्र और देवता द्वारा निपटाये जाते थे । पर कुछ वर्षों से स्थानीय प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद अब मामले अदालतों में भी जाने लगे हैं । खासकर चरस तस्करी में पकडे गए स्थानीय ग्रामीणों को कुल्लू की अदालती कारवाई से ही गुजरना पड़ता है । साथ ही जमीनी विवाद भी अब जिला न्यायालय में आने लगे हैं । फिर भी जितने भी मामले गाँव से बाहर जिला न्यायालय में जाते हैं , उनसे संबंधित लोगों को देवता को हर्जाना देना पड़ता है । परंतु जो लोग अभी भी देव निर्णय में ही मानते हैं उनके लिए देवता का अंतिम निर्णय ही सर्वमान्य होता है।

जमलू देवता (जमदग्नि ऋषि) और मलाणा –

malana10पौराणिक कथा के अनुसार जमदग्नि ऋषि , विष्णु के अवतार परशुराम के पिता थे । कालांतर में निचले क्षेत्रों में पापाचार बढ़ने के कारण ऋषि के ध्यान साधना में विघ्न पड़ने लगा । इस कारण जमदग्नि ऋषि ने शिव का आव्हान किया । उन्होंने शिव से ऐसे स्थान की अभिलाषा जताई , जहाँ एकांत हो और प्रकृति अपने यौवन के रस से परिपूर्ण हो । शिव ने महृषि को हिमालय में इस स्थान पर जाकर तप साधना करने के लिए कहा । कहते हैं ऋषि ने जब इस स्थान के लिए प्रस्थान किया तो उनके दो भाइयों ने भी उनके इस हिमालय पथ का अनुसरण किया । घाटी के समीप पहुँचने पर ऋषि ने अपने भाइयों को भ्रमित करने के लिए चारों ओर कोहरे का निर्माण कर दिया । इस कारण उनका एक भाई लाहौल की ओर चला गया और दूसरा बंजार घाटी की ओर । उस समय मलाणा का सम्पूर्ण क्षेत्र बाणासुर राक्षस के अधीन आता था । 
ऋषि और बाणासुर के बीच विरोध उत्पन्न हो गया , जिसे अंततः उन्होंने एक शान्ति संधि करके विराम दिया । इस संधि के अनुसार सारे प्रशासनिक निर्णय बाणासुर के अधीन होंगे और न्यायिक निर्णय ऋषि के अधीन रहेंगे । जैसे-जैसे गाँव के रीति रिवाजों का प्रचलन शुरू हुआ कनाशी भाषा को गाँव की आधिकारिक भाषा चुन लिया गया । 
समय बीतने के साथ ऋषि ने बाणासुर पर अपना प्रभाव सुनिश्चित तो कर दिया , परंतु प्रथाओं में आज भी रक्ष प्रजाति के कलापों का प्रभाव मौजूद है । लोग देवता जमलू (जमदाग्नि) को सर्वेसर्वा मानते हैं । देवता से पूछे बिना कोई भी शुभ कार्य गाँव में नहीं किये जाते । 

 

कणाशी बोली – मलाणा वासियों द्वारा बोली जाने वाली कणाशी बोली संस्कृत और तिब्बती भाषा का मिलाजुला अपभ्रंश रूप माना जाता है । बाहरी लोगों से इस बोली में व्यवहार करना निषेध है । एक मान्यता ये भी है कि ये राक्षसों की भाषा है । साहित्यकार भी इस बोली को वर्णित करने में अक्षम रहे हैं।

Malana5
ग्रामीणों का रहन सहन मलाणा वासियों का रहन सहन बहुत साधारण है । यहां के घर अधिकतर हिमाचली काठकुनी शैली में निर्मित किये जाते हैं । जो देवदार की लकड़ी और पत्थरों से बनाये जाते हैं । पत्थरों की चिनाई के लिए मिटटी का प्रयोग किया जाता है । 

Malana4हाल के वर्षों में चरस माफिया के आने से पूर्व ग्रामीणों का मुख्य कार्य पशुपालन , खेती और जड़ी बूटियों का संग्रह करना होता था । वर्तमान में यहाँ सरकार द्वारा एक स्कूल खोला गया है । गाँव में एक आयुर्वेदिक लघु चिकित्सालय भी खोला गया है । लोगों के रहन सहन में परिवर्तन आया है जिस कारण अब ग्रामीणों द्वारा अन्य स्थानों की तरह बहुमंजिला आधुनिक भवनों का निर्माण किया जा रहा है । पहले जहां ग्रामीण पढ़ाई लिखाई से दूर रहते थे , अब नई पीढी की रूचि इसमें जागृत हुई है । गाँव में रोजमर्रा की वस्तुओं की दुकानें खुल गई हैं ।
परंतु प्रकृति के प्रति इनके नियम अभी भी पहले के सामान कठोर हैं । गाँव वासीयों के लिए किसी भी पेड़ में कील गाड़ना और पेड़ो/जंगल में आग लगाना निषेध है । 

मलाणा गाँव के त्यौहार

Malana9मलाणा गाँव में मुख्यता दो त्यौहार मनाए जाते हैं । पहला है फागली उत्सव , जो फरवरी माह में मनाया जाता है । दूसरा है बडोह उत्सव , जो 15 अगस्त को मनाया जाता है । बडोह उत्सव का स्वतंत्रता से कोई लेना देना नहीं है । बल्कि ये दोनों उत्सव देवता जमलू के सम्मान में मनाए जाते हैं । बडोह उत्सव के लिए कुल्लू जनपद के अलग अलग स्थानों से सैंकड़ो लोग देवता के सम्मान में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने मलाणा जाते हैं । इन उत्सवों में देवता के पवित्र चिन्हों के रूप में जमदाग्नि ऋषि से सम्बंधित वाद्य यंत्र , आभूषण और विशेष वस्त्र प्रदर्शित किए जाते हैं । इस महोत्सव में स्त्री और पुरुष अपने पारंपरिक परिधानों , चोलू/टोपी/पाजामा/पट्टू और आभूषणों से सुस्सजित होकर , नरसिंघा/शहनाई/करनाली/नगाड़े की धुन पर देवता के प्रांगण में एक गोल चक्र बनाकर पारंपरिक नृत्य नाटी करते हैं। दूसरी और फागली उत्सव का मुख्य आकर्षण राक्षसी मुखौटों के साथ किया जाने वाला नृत्य होता है । जिसे ग्रामीणों का बाणासुर के प्रति सम्मान माना जाता है। 

मलाणा अग्निकांड 2008 –

Malana12वर्ष 2008 में मलाणा में भीषण अग्निकांड हुआ । जिसमें लगभग आधा गाँव आग की भेंट चढ़ गया था । इस अग्निकांड में देवता जमलू का मंदिर भी स्वाहा हो गया । मंदिर के भण्डार में संरक्षित पौराणिक महत्व की सभी वस्तुएं नष्ट हो गईं , और साथ ही नष्ट हो गया प्राचीन हिमालयी एथेंस कहे जाने वाले मालाणा का एक बहुमूल्य पहलू। 
हालांकि प्रशासन के सहयोग से ग्रामीणों ने गाँव फिर से बसा लिया , पर अग्निकांड अपने साथ बहुत कुछ लील चुका था । गाँव के लोगों का मत है कि बाहरी दुनिया के अधिक हस्तक्षेप के कारण उन्हें देवता के कोप का भागी बनना पड़ा । बार-बार की देव चेतावनियों को अनदेखा किया गया। 


मलाणा की संस्कृति और ग्रामीण अस्तित्व का क्षरण करती , चरस (मलाणा क्रीम)

malana7सांस्कृतिक और अनोखी परम्परों से समृद्ध मलाणा को वास्तविक ग्रहण उस समय लगा जब अंतरराष्ट्रीय चरस माफिया का ध्यान यहां की चरस की गुणवत्ता पर गया । मलाणा में प्राकृतिक रूप से उगने वाली चरस का प्रयोग ग्रामीण अपने पीने के लिए और भांग के पौधों से मिलने वाले रेशों के लिए करते थे । इन रेशों को गूंथकर ग्रामीण रस्सी , मांदरी(चटाई) , पैरों में पहने जाने वाली स्थानीय पूलें (एक प्रकार की चप्पल) और अन्य छोटी मोटी वस्तुएं बनाते थे । चरस के लिए यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियां अत्यन्त अनुकूल हैं । पर्यटन बढ़ने के साथ यहां पर्यटकों के साथ चरस माफिया को भी यहां की उच्च गुणवत्ता वाली चरस का पता चला । धीरे-धीरे उन्होंने इस चरस के व्यवसाय में ग्रामीणों को भी संलिप्त कर लिया । स्थानीय ग्रामीण भी बेहिसाब पैसा देख खुले तौर पर चरस की खेती बड़े पैमाने पर करने लग गए । आज यहाँ का व्यक्ति भौतिक सुविधाओं का आदी हो चुका है । भारत के भी अधिकतर पर्यटक केवल नशे की अपनी लोलुपता वश यहां आते हैं । चरस के हाइब्रिड बीजों के साथ धन के लालच का बीज चरस माफिया द्वारा बड़ी चतुराई से भोले-भाले ग्रामीणों के बीच बोया गया है । यहाँ के बहुत से ग्रामीण चरस की स्मगलिंग के आरोप में जेल में बंद हैं । और दुःख का विषय है , इनमें महिलाओं की संख्या भी काफी है । इस ग्रामीण समाज के क्षरण का सबसे बड़ा कारण हॉलैंड और इस्राइल का चरस माफिया है । प्रशासन पूरी कोशिश करता है कि ग्रामीणों को भांग की खेती का उचित विकल्प मुहैय्या करवाया जाए । पर धन का लालच उन्हें वापिस इसी दलदल में खींच लेता है । ये यहाँ की वेदना है कि इस कारण हर वर्ष एक दो परिवार बर्बाद हो रहे हैं । और साथ ही एक स्वर्णिम और सहेजने लायक इतिहास का पतन हो रहा है । 
 

अंत में दो बातें  परंतु फिर भी वर्तमान परिपेक्ष्य में अपवादों और विवादों के बावजूद मलाणा आज भी पौराणिक संस्कृति और प्राकृतिक छटा का अद्वितीय सौंदर्य समेटे एक अनोखा और विस्मित करने वाला स्थान है । ग्रामीणों का मित्रवत और सरल व्यवहार आपको उनके प्रति आकर्षित करता है । इस संस्कृति का अनुभव जीवन का एक यादगार अनुभव है । यहाँ पहुँचने में अलौकिक रोमांच है , घाटी में फैली शान्ति है , आध्यात्मिक संतुष्टि है और रहस्यमयी जिज्ञासा है । ये निश्चित है कि मलाणा जैसा अनुभव आपको अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकता ।

Comments

Comments

Similar Articles

Top