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देवेश पाण्डेय : जिन्होंने पलायन रोकने की सकारात्मक सोच के साथ की “कैफ़े अमिगोस” शुरुवात

देवभूमि उत्तराखण्ड के बेटे बेटियाँ देश दुनियाँ के हर एक हिस्से में अपने अपने कार्य छेत्रों में सफलता की उचाईयों को छू रहें हैं, लेकिन उनमे से ज्यादातर लोग वो हैं जिन्होने सफलता पाने के बाद कभी उत्तराखण्ड को पलट कर नहीं देखा | परन्तु ऐसे भी कुछ नाम हैं, जिन्होंने मेट्रो शहरों में लाखों के पैकेज ठुकरा कर अपने राज्य वापस आने की ठानी और अपना व्यवसाय शुरू किया, साथ ही साथ स्थानीय युवाओं को भी रोजगार दिया, ऐसे ही नामों में से एक नाम है  पिथौरागढ़ के देवेश पाण्डेय का |

देवेश बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद पुने चले गए, जहाँ उन्होंने कंप्यूटर साइंस में बैचलर्स किया और पुणे से ही बिज़नेस मैनेजमेंट में मास्टर्स की डिग्री हासिल की | अपना कैफ़े खोलने से पहले देवेश HDFC बैंक में बतौर डेपुटी मैनेजर कार्यरत थे|

पोस्ट ग्रेजुएशन करते वक्त ही देवेश का सपना था की वो अपना खुद का व्यवसाय करें, लेकिन फंड्स के कमी की वजह से वो उस वक्त अपना व्यवसाय शुरू नहीं कर पाये और उन्होंने पैसे इकट्ठे करने के लिए बैंक में जॉब की | ५ साल तक बैंक में नौकरी करने के बाद जब देवेश के पास पर्याप्त धन जमा हो गया तब उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़ दी|

नौकरी के दौरान देवेश यहीं सोचा करते थे की एजुकेशन और आईटी हब पुणे उनके स्टार्टअप के लिए मुरीद जगह रहेगी, लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी वजह से देवेश की सोच पूरी तरह बदल गयी |

देवेश बताते हैं की वो सोशल मीडिया पे आये दिन पढ़ते थे कि  उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों से बड़े पैमाने पर पलयान हो रहा है, युवा रोजी रोटी की तलाश में बड़े शहरों की तरफ रुख कर रहें हैं | सोशल मीडिया पर लोग इस विषय पे चिंता तो जाहिर कर रहे होते हैं लेकिन आगे आके कोई कुछ पहल नहीं करता है | देवेश को अहसास हुआ की दिल्ली, मुंबई, पुणे जैसे शहरों में बैठ कर उत्तराखण्ड में पलायन के विषय पर सोशल मीडिया पर चर्चा करने का कोई फायदा नहीं है, इसलिए उन्होंने खुद पहल करने की ठानी और अपने गृह नगर पिथौरागढ़ में कैफ़े का व्यवसाय शुरू किया|

पिथौरागढ़ जैसे शहर में कैफ़े खोलना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी, क्युकी इस शहर के लिये यह फॉर्मेट बिलकुल नया था | लेकिन देवेश ने सकारात्मक सोच के साथ शुरुआत की और शहर के लोगों को रियल कॉफी के स्वाद से अवगत कराया | देवश गर्व से कहते हैं की कैफ़े अमिगोस पिथौरागढ़ में इस तरह का पहला कैफ़े है |

देवेश बताते हैं की यह कभी सम्भव नहीं हो पाता अगर उनके छोटे भाई ने उनका साथ नहीं दिया होता | कैफ़े अमिगोस की अनोखी डिजाइनिंग उनके छोटे भाई ने ही की है और साथ ही साथ बिज़नेस स्ट्रेटेजी बनाने में भी उन्होंने देवश की पूरी मदद की |

महज 2  लोगों से शुरू हुये कैफ़े अमिगोस में आज  पिथौरागढ़ के 10  युवा काम करते हैं, जिन्हे देवेश की सोच की वजह से अपने गृह नगर में ही रोजगार मिला, उन्हें रोजगार के लिये किसी बड़े शहर में जाके धक्के खाने को मजबूर नहीं होना पड़ा |

 

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